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' भोले बाबा के दरबार ' - Jyoti rai

' भोले बाबा के दरबार ' - Jyoti rai : 'गूँज रहें हैं गली-गली में बोल बम के जयकारे, ताता लगा है भक्तों का भोले बाबा के द्वारे, सावन की पावन बेला में, बाबा धरती पर आते हैं, मन की सारी मुरादें भक्तों की पूरी कर जाते हैं, कावंर में गंगा जल भर के वस्त्र नारंगी डाले, भक्ति रस में डूबे है सब भूले पाँव…
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“जन्नत को दोज़ख़ बनाने में पाकिस्तान का हाथ रहा, पीठ में छूरा घोंपने में आतंकवाद का साथ रहा, वादी की चाहत में सैंतालिस से जतन किये, अपने नापाक इरादों से निज राष्ट्र का पतन किए, मासूमों को हथियार थमा, विष का बेल जो बोते हैं, हथियार,आतंकी हमले इनके खेल खिलौनें होते हैं, हूर और जन्नत पाने को आतंकी बन जाते हैं, सेना के आगे हर बार ही मुँह की खाते हैं, निन्यान्वे मई माह में फिर से धावा बोल दिया, चढ़कर कारगिल की चोटी पर नया मोर्चा खोल दिया, दुर्गम चोटी को सैनिक छीन के वापस ले आये , गीदड़ों को जाबाज़ सिपाही अपनी ताकत दिखलाये भारत ने फिर से एक बार विजय पताका फ़हराया, जीत का यह सुअवसर कारगिल विजय दिवस कहलाया”

'ये कैसा मंज़र है' - Jyoti rai

'ये कैसा मंज़र है' - Jyoti rai : 'हर घड़ी उत्पात है,ये कैसा मंज़र है, बिन बादल बरसात है, ये कैसा मंज़र है, जिसको देखो लिप्त है,निंदा और नफरत में, अचरज की हर बात है,ये कैसा मंज़र है, ऊपर से सब प्यार दिखाते,छुपा के रखा खंजर है , भीतर सबके घात भरा ये कैसा मंज़र है, महफूज नही अब रहा कोई, नित बढ़ते…

' बिटिया गाय हमारी ' - Jyoti rai

' बिटिया गाय हमारी ' - Jyoti rai : 'शादी के दो हफ़्ते बीते हँसी खुशी मुस्काते, पत्नी जी तब मान रही थीं मेरी सारी बातें, एक रोज़ जीवन में मेरे घना अंधेरा छाया, बीवी का असली स्वरूप जब सामने मेरे आया, गुस्से में मुझ पर वो बड़ी जोर से चिल्लाई, डर के मारे पलंग से मैंने तुरंत छलांग लगायी, कोने में जा दुबक�%A...

" जागो अब सरकार "

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“राम राज तो रहा ना बाकी, जब से कलयुग आया , पाप ने घर-घर जाकर देखो, कैसे पाँव फैलाया , जो फूल घरों की बगिया को बरसो महकाया करती , वो डोली चढ़ने से पहले अब अर्थी पर जाती , जागो,जागो अब सरकार,रोको बढ़ता अत्याचार , बेटी बचाने की पहल हो जाए ना बेकार , चहुँओर मची हुईं है जग में हाहाकार , जागो,जागो अब सरकार ,रोको बढ़ता अत्याचार , चन्द माह के बच्ची की, जां ले लेते हैवान , दुष्कर्म करें संग उसके, हवस में अंधे हैं शैतान , द्रोपदी की सुन चीख स्वयं आए थे भगवान, जो अबोध ना बोल सकी, रह गये उससे अंजान , आते आज अगर हो जाता, उनको ज़रा भी भान , मुश्किल में है धरती पर, लाखों मासूमों की जान , जो कहते है रेप का कारण होता है परिधान , मासूमों संग इस घटना पर क्या देंगे वो ज्ञान , जागो,जागो अब सरकार, रोको बढ़ता अत्याचार , कान्हा की तो खबर नही, दुशासन घर -घर पाते , रोज़ सुबह खबऱों में कोई दुर्घटना सुन जाते , घृणा हैं हत्याओं पर भी नेता सियासत करते हैं , सांप्रदायिकता के रंग में ऐसी घटना को रंग देते हैं , मासूमो के ज़ख़्मों पर धर्म का रंग चढ़ाते हैं , भगवा है या हरा देखकर हाल पूछने जाते हैं , हैवानों की हरकत से बढ़ रहा...

वो नारी है

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                                                        वो नारी है  “अग्नि की उठती ज्वाला सी,कभी ढलते सूरज की लाली है, ममतामयी माँ दुर्गा सी,कभी रुद्र वो चंडी काली है, अबला कहते हो उसको, जो दैत्यों पर भी भारी है, हर वीर को जिसने जन्म दिया,वीरांगना वो नारी है, कभी रजिया सुल्ताना सी कभी लक्ष्मीबाई बन जाती है,  गृहलक्ष्मी है वो कोमल सी,कभी जंग में तलवार चलाती है, मां बहन के रूप में मिली तुम्हें,कोई औरत तेरी घरवाली है, कोई दरवाजे की मर्यादा में,कोई मर्दन करती शेरावाली है, हुआ विनाश उन सबका जिसने बुरी निगाहें डाली है , रावण हो या महिषासुर,या रहा कोई शक्तिशाली है, चुप रह कर वो सहती है तो, अबला नहीं समझ लेना, निगलने की क्षमता है उसमें,बेहतर हो पहले संभल लेना, नहीं कम है वो तुमसे, है उसमें उद्गार भरा,   हर नारी के अंदर शक्ति का भंडार भरा, नारी ही है जो पुरूषों का अस्तित्व बनाती हैं, माँ स्वरूप पर जिसके पूरी दुनिया शीश झुक...

हमारा वक़्त आया

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              “जग ने औरत को बातों में खूब उलझाया, बखाने हुस्न के लफज़ो में बरसों बहलाया, ना हक दिया, ना आजादी कोई , बस गृहस्वामिनी कहके बुलाया, छूती रही पाँव परमेश्वर कह पति को, पति विष्णु हुए औरत को लक्ष्मी बताया, जकड़ दिया संस्कृति और सभ्यता की ज़ंजीरों में, औरत को शादी का बंधन समझाया, चूड़ी,कंगना ,पायल,बिंदिया, सिंदूर को उम्र की अपनी रेखा बताया , सुहागन की होती है सारी निशानी, निशानियों में सर से पांव तक सजाया , नकेल, बेड़िया, हथकड़ियों में जकड़ने को, स्वर्ण धातु का ‘जाल ज़ेवर’ बिछाया, सहनशीलता,लज्जा है,औरत का गहना, संस्कारों की दुहाई का घेरा बनाया, चलती रहे चक्की जलता रहे चूल्हा, इसीलिए औरत को अन्नपूर्णा बुलाया, क्रोध का हक़ भी छोड़ा ना बाकी, ममता की सागर हो कहके डुबकी लगाया, खुद पर नियंत्रण तो रख ना सके, औरत को पर्दे के नीचे छुपाया, खून से सिंचकर जनम जिसने दिया, हक़ उसका सभी एक पल में मिटाया, संतानें भी हो गयीं पति की अमानत, बाप का नाम ही, संग उनके चिपकाया, परंपरा खुद की खातिर खुद ही बनाकर, शास्त्रों के पन्नों का पाठ पढ़ाया,...